- कोरबा, छत्तीसगढ़: 2009 में कोरबा स्थित भारत एल्यूमिनियम कंपनी लिमिटेड (बालको) की निर्माणाधीन चिमनी ढहने की घटना को 14 साल से अधिक बीत चुके हैं, लेकिन पीड़ितों को अब भी न्याय का इंतजार है। इस दर्दनाक हादसे में 40 से अधिक मजदूरों की जान चली गई थी और कई घायल हुए थे। हाल ही में, स्थानीय अदालत ने इस मामले की पुलिस जांच पर गंभीर सवाल उठाए हैं, जिससे पीड़ितों के परिवारों को एक बार फिर न्याय की उम्मीद जगी है।
अदालत ने जताई नाराजगी:
अदालत ने पुलिस की जांच में कई खामियां पाईं हैं। अदालत ने कहा कि जांच में कई महत्वपूर्ण बिंदुओं को अनदेखा किया गया है, और ठोस सबूत जुटाने में भी लापरवाही बरती गई है। अदालत ने विशेष रूप से घटना के लिए जिम्मेदार लोगों की पहचान और उनके खिलाफ उचित कार्रवाई करने में पुलिस की विफलता पर नाराजगी जताई।
पीड़ित परिवारों का दर्द:
इस हादसे में अपने प्रियजनों को खोने वाले परिवार आज भी गहरे सदमे में हैं। उन्होंने आरोप लगाया है कि पुलिस ने शुरू से ही इस मामले को गंभीरता से नहीं लिया और प्रभावशाली लोगों को बचाने की कोशिश की। पीड़ित परिवारों का कहना है कि वे तब तक संघर्ष करते रहेंगे जब तक उन्हें न्याय नहीं मिल जाता।
मामले की पृष्ठभूमि:
23 सितंबर, 2009 को बालको के पावर प्लांट में 275 मीटर ऊंची चिमनी का निर्माण कार्य चल रहा था। तभी अचानक चिमनी ढह गई, जिससे वहां काम कर रहे मजदूर मलबे में दब गए। इस हादसे में 40 से अधिक मजदूरों की मौत हो गई और कई घायल हो गए।
जांच की मांग:
पीड़ित परिवारों ने इस मामले की निष्पक्ष जांच की मांग की है। उन्होंने कहा कि इस हादसे के लिए जिम्मेदार लोगों को सख्त सजा मिलनी चाहिए। उन्होंने सरकार से इस मामले में हस्तक्षेप करने और पीड़ितों को न्याय दिलाने का आग्रह किया है।
आगे की कार्रवाई:
अदालत के ताजा रुख के बाद, इस मामले में आगे की जांच की संभावना बढ़ गई है। पीड़ित परिवारों को उम्मीद है कि अब उन्हें न्याय मिलेगा और इस दर्दनाक हादसे के लिए जिम्मेदार लोगों को सजा मिलेगी।
मुख्य बिंदु:
* 2009 में बालको चिमनी हादसे में 40 से अधिक मजदूरों की मौत हुई थी।
* 14 साल बाद भी पीड़ितों को न्याय का इंतजार है।
* अदालत ने पुलिस जांच पर गंभीर सवाल उठाए हैं।
* पीड़ित परिवारों ने निष्पक्ष जांच की मांग की है।
* अदालत के ताजा रुख से न्याय की उम्मीद जगी है।