मणिका दुबे
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अधिक नहीं चाहा है तुमसे, बस इतना अधिकार जताना
भले सुखों से वंचित रखना, पर दुःख का हक़दार बनाना
द्वार बजाएँगी तकलीफ़ें तो दरवाज़ा मैं खोलूँगी
कुछ दिन की मेहमान हैं ये भी, इनसे हँसकर मैं बोलूँगी
विपदा जीवन का पहलू है, इस पहलू से हार न जाना
भले सुखों से वंचित रखना, पर दुःख का हक़दार बनाना
रोने से पुरुषत्व किसी का, आहत नहीं हुआ करता है
ऐसा कौन हुआ गम जिसको, जग में नहीं छुआ करता है?
रोने को कंधा मेरा है, इस पर अश्रुधार बहाना
भले सुखों से वंचित रखना, पर दुःख का हक़दार बनाना
कुछ तकलीफ़ें ऐसी हैं जो, कह लेने से कम होती हैं
कहने-सुनने की आज़ादी, घावों का मरहम होती है
मुझे ज़रूरी सा लगता है, तुम पर आया भार उठाना
भले सुखों से वंचित रखना, पर दुःख का हक़दार बनाना
ऐसा थोड़ी है कि, संग बस सहज राह में पैर चलेंगे
वादा अगर किया है तो, हर कठिन मोड़ पर साथ रहेंगे
ज़िम्मेदारी पहले आती है, फिर आता प्यार लुटाना
भले सुखों से वंचित रखना, पर दुःख का हक़दार बनाना
