बीजिंग, 03 मार्च 2025: चीन ने इनर मंगोलिया के विशाल क्षेत्र में एक ऐतिहासिक खोज की है—एक विशाल थोरियम खदान, जो देश के ऊर्जा परिदृश्य को हमेशा के लिए बदल सकती है। वैज्ञानिकों और ऊर्जा विशेषज्ञों का अनुमान है कि इस खदान से प्राप्त थोरियम का उपयोग कर मोल्टन-सॉल्ट रिएक्टरों के जरिए चीन अगले 60,000 साल तक अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा कर सकता है। यह खोज न सिर्फ चीन के लिए, बल्कि वैश्विक ऊर्जा क्षेत्र के लिए भी एक बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है।
थोरियम: ऊर्जा का नया सितारा
थोरियम एक रेडियोधर्मी तत्व है, जो यूरेनियम की तुलना में पृथ्वी पर कहीं अधिक प्रचुर मात्रा में पाया जाता है। पारंपरिक यूरेनियम आधारित रिएक्टरों के विपरीत, थोरियम मोल्टन-सॉल्ट रिएक्टर अधिक सुरक्षित माने जाते हैं। ये रिएक्टर न केवल कम रेडियोधर्मी कचरा उत्पन्न करते हैं, बल्कि परमाणु दुर्घटना के जोखिम को भी काफी हद तक कम करते हैं। इसके अलावा, थोरियम का उपयोग परमाणु हथियार बनाने में मुश्किल होता है, जिससे यह तकनीक वैश्विक सुरक्षा के लिए भी अनुकूल मानी जाती है।
चीन की महत्वाकांक्षी योजना
चीन पहले से ही थोरियम आधारित ऊर्जा पर बड़ा दांव लगा रहा है। गोबी रेगिस्तान में दुनिया का पहला थोरियम मोल्टन-सॉल्ट रिएक्टर बनाया जा रहा है, जिसे 2029 तक चालू करने का लक्ष्य रखा गया है। यह परियोजना चीन की उस रणनीति का हिस्सा है, जिसके तहत वह कोयले पर अपनी निर्भरता को कम करना चाहता है। वर्तमान में चीन की ऊर्जा का बड़ा हिस्सा कोयले से आता है, जो भारी प्रदूषण का कारण बनता है। थोरियम तकनीक के जरिए चीन न केवल स्वच्छ ऊर्जा की ओर कदम बढ़ा रहा है, बल्कि ऊर्जा स्वतंत्रता हासिल करने की दिशा में भी तेजी से आगे बढ़ रहा है।
वैश्विक संदर्भ में महत्व
थोरियम पर शोध कोई नई बात नहीं है। 20वीं सदी से ही अमेरिका, भारत और अन्य देश इस तत्व की संभावनाओं को तलाश रहे हैं। भारत, जहां थोरियम के बड़े भंडार मौजूद हैं, ने भी इस दिशा में कदम उठाए हैं। हालांकि, लागत प्रभावी निष्कर्षण और तकनीकी जटिलताओं के कारण यह तकनीक अभी तक व्यापक स्तर पर लागू नहीं हो सकी। चीन की यह नई खोज और उसकी महत्वाकांक्षी परियोजनाएं इस क्षेत्र में एक नया मोड़ ला सकती हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर चीन इस तकनीक को सफलतापूर्वक लागू कर लेता है, तो यह अन्य देशों के लिए भी प्रेरणा बन सकता है।
चुनौतियां और भविष्य
हालांकि थोरियम ऊर्जा के फायदे स्पष्ट हैं, लेकिन इसके सामने कुछ चुनौतियां भी हैं। थोरियम को ऊर्जा में बदलने की प्रक्रिया अभी भी महंगी और जटिल है। साथ ही, कुछ आलोचकों का मानना है कि थोरियम रिएक्टरों से उत्पन्न सामग्री को परमाणु हथियारों के लिए इस्तेमाल करने का जोखिम पूरी तरह खत्म नहीं किया जा सकता। फिर भी, चीन का दावा है कि उसने इन समस्याओं का समाधान खोज लिया है और वह जल्द ही इसे दुनिया के सामने पेश करेगा।
पर्यावरण और अर्थव्यवस्था पर प्रभाव
यह खोज पर्यावरण के लिहाज से भी गेम-चेंजर साबित हो सकती है। कोयले से चलने वाले बिजली संयंत्रों की जगह थोरियम रिएक्टर लेते हैं, तो कार्बन उत्सर्जन में भारी कमी आएगी। साथ ही, ऊर्जा उत्पादन की लागत कम होने से अर्थव्यवस्था को भी बल मिलेगा। इनर मंगोलिया की यह खदान न केवल ऊर्जा संसाधन प्रदान करेगी, बल्कि क्षेत्र में रोजगार के नए अवसर भी पैदा कर सकती है।
निष्कर्ष
चीन की यह खोज एक बार फिर साबित करती है कि वह नवाचार और तकनीकी प्रगति में अग्रणी बनने की राह पर है। अगर यह परियोजना सफल होती है, तो थोरियम ऊर्जा का युग शुरू हो सकता है, जो स्वच्छ, सुरक्षित और टिकाऊ भविष्य की नींव रखेगा। दुनिया भर की नजरें अब चीन पर टिकी हैं, जो इस खोज को हकीकत में बदलने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है।