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ब्यूरोक्रेसी की महाभारत, अर्जुन और भीष्म के वैचारिक युद्ध की कहानी है ‘एस्पिरेंट्स 3’, क्या उम्मीदों पर खरी उतरी नवीन कस्तूरिया की सीरीज?

एस्पिरेंट्स’ सीजन 3 यूपीएससी के बाद की प्रशासनिक चुनौतियों और टूटते रिश्तों की कहानी है, जहां नवीन कस्तूरिया और जतिन गोस्वामी का अभिनय प्रभावित करता है, वहीं धीमी रफ्ता और संदीप भैया का सीमित स्क्रीन टाइम खलता है। जानें पूरा रिव्यू।टीवीएफ की चर्चित सीरीज ‘एस्पिरेंट्स’ ने हमेशा से एक खास तरह की सादगी और वास्तविकता को पर्दे पर उतारा है। ओल्ड राजेंद्र नगर की तंग गलियों से लेकर यूपीएससी क्रैक करने के बाद की जटिल सच्चाइयों तक इस शो ने यह बखूबी समझा है कि असली कहानी सिर्फ परीक्षा पास करने के बारे में नहीं है, बल्कि उस प्रक्रिया में आपके व्यक्तित्व में आने वाले बदलावों के बारे में है। ढाई साल के लंबे इंतजार के बाद आया तीसरा सीजन उसी भावनात्मक गहराई को आगे बढ़ाता है, हालांकि इस बार संघर्ष किताबों से हटकर पावर, पॉलिटिक्स और पुराने रिश्तों के बीच उलझ गया है।
सत्ता की कुर्सी और अतीत का साया
सीजन 3 की शुरुआत एक रहस्यमयी हमले के साथ होती है, जहाँ दो नकाबपोश मोटरसाइकिल सवार किसी पर हमला करते हैं। इस हमले का शिकार कौन है, यह राज सीजन के अंत तक बना रहता है। इस बीच, हमारे मुख्य पात्र अभिलाष (नवीन कस्तूरिया) की जिंदगी में काफी उथल-पुथल है। रामपुर के जिला मजिस्ट्रेट के रूप में तैनात अभिलाष के लिए अब राहें आसान नहीं रहीं। भ्रष्टाचार के आरोप और संदीप भैया (सनी हिंदुजा) द्वारा शुरू की गई जांच ने उसके करियर पर संकट के बादल मंडरा दिए हैं। शो इस बात को बड़ी संजीदगी से दिखाता है कि जब आप सत्ता के ऊंचे पदों पर होते हैं तो आपकी एक छोटी सी चूक या अतीत का कोई फैसला कैसे आपके भविष्य को अनिश्चित बना सकता है।महाभारत के पात्र और वैचारिक टकराव
इस सीजन में एक नया और दिलचस्प मोड़ तब आता है जब अभिलाष का सामना पवन कुमार (जतिन गोस्वामी) से होता है। संबल के डीएम पवन और अभिलाष का अतीत काफी कड़वा रहा है। दोनों के बीच की तल्खी पहले ही सीन से साफ झलकती है। एक प्रभावशाली संवाद में पवन खुद को ‘इस महाभारत का अर्जुन’ कहता है, जिसके जवाब में अभिलाष बड़ी शांति से खुद को ‘भीष्म पितामह’ बताता है। यह तुलना पूरी सीरीज के दौरान उनके बीच के वैचारिक और रणनीतिक युद्ध को परिभाषित करती है। पवन का किरदार भाषाई हाशिए पर खड़े उस छात्र का प्रतिनिधित्व करता है जो हिंदी मीडियम से होने के कारण अंग्रेजी माध्यम के छात्रों (जैसे अभिलाष) से खुद को कमतर और वंचित महसूस करता रहा है।
त्रिकोणीय दोस्ती में बढ़ती दूरियां
‘एस्पिरेंट्स’ की सबसे बड़ी ताकत हमेशा से अभिलाष, गुरी और एसके की दोस्ती रही है। लेकिन इस सीजन में यह ‘ट्राइपॉड’ काफी डगमगाता हुआ नजर आता है। एसके (अभिलाष थपलियाल), जो कभी अभिलाष का सबसे मजबूत स्तंभ था, अब उससे दूर हो चुका है। रिश्तों में आए इस बदलाव को निर्देशक दीपेश सुमित्रा जगदीश ने बहुत ही सूक्ष्मता से फिल्माया है। शो यह सवाल उठाता है कि क्या पद और प्रतिष्ठा पुरानी दोस्ती को निगल जाती है? क्या एक अधिकारी बनने के बाद वह इंसान कहीं खो जाता है जो कभी अपने दोस्तों के लिए जान छिड़कता था? गुरी और धैर्य के साथ अभिलाष के रिश्ते भी इस सीजन में नई चुनौतियों और भावनात्मक उतार-चढ़ाव से गुजरते हैं।

वर्ग भेद और भाषाई दीवारों का चित्रण
लेखक दीपेश सुमित्रा जगदीश, अनुराग गोस्वामी और अनुराग रमेश शुक्ला ने ब्यूरोक्रेसी के भीतर मौजूद क्लास डिवाइड और भाषा की बाधा को बड़ी सूक्ष्मता से उभारा है। पवन कुमार का किरदार यह दिखाता है कि कैसे सिस्टम के भीतर भी एक अदृश्य विभाजन है। हिंदी माध्यम के छात्रों का संघर्ष केवल किताबों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि अधिकारी बनने के बाद भी उन्हें अपनी जगह बनाने के लिए संघर्ष करना पड़ता है। अभिलाष ने कभी जानबूझकर पवन का बुरा नहीं किया, लेकिन पवन के मन में जमी हुई हीन भावना और नाराजगी प्रशासनिक कार्यों के दौरान बार-बार सामने आती है, जो कहानी में तनाव पैदा करने का काम करती है।
अभिनय और तकनीकी पक्ष
नवीन कस्तूरिया ने एक बार फिर अभिलाष के रूप में एक सधा हुआ प्रदर्शन किया है। उनके चेहरे पर दिखने वाली दुविधा और एक अधिकारी की गंभीरता उनके अभिनय को विश्वसनीय बनाती है। शिवांकित सिंह परिहार (गुरी) की सादगी और सनी हिंदुजा (संदीप भैया) की गंभीरता कहानी में वजन बढ़ाती है। नए शामिल हुए जतिन गोस्वामी ने पवन के रूप में एक नियंत्रित और प्रभावशाली प्रदर्शन किया है, जो अंत तक अपनी छाप छोड़ता है।
तकनीकी तौर पर टीवीएफ ने अपनी वास्तविकता बनाए रखी है। म्यूजिक हमेशा से इस शो की जान रहा है। जहाँ पिछले सीजन में ‘धागा’ और ‘बैरगी’ जैसे गीतों ने दिल जीता था, वहीं इस बार ‘लमहा लमहा’ और ‘ज़िंदगी से बड़ी सजा ही नहीं’ जैसे गाने दृश्यों के प्रभाव को दोगुना कर देते हैं। प्रोडक्शन डिजाइन और बैकग्राउंड स्कोर कहानी की संवेदनशीलता को बनाए रखने में मदद करते हैं।
कुछ खामियां
‘एस्पिरेंट्स’ सीजन 3 की सबसे बड़ी खूबी इसका परिपक्व लेखन और किरदारों का भावनात्मक विकास है, जो सत्ता में आने के बाद की जटिलताओं को बखूबी दर्शाता है। नवीन कस्तूरिया और जतिन गोस्वामी का अभिनय प्रभावशाली है, वहीं ‘लम्हा लम्हा’ जैसे गाने कहानी की संवेदनशीलता को बढ़ाते हैं। हालांकि इसकी मुख्य खामी इसकी धीमी गति और कुछ दृश्यों का अनुमानित होना है, जिससे पहले सीजन जैसा रोमांच कम महसूस होता है। साथ ही संदीप भैया और एसके जैसे चहेते किरदारों को इस बार उतना स्क्रीन टाइम नहीं मिला, जिसकी प्रशंसकों को उम्मीद थी। कुल मिलाकर यह सीरीज प्रशासनिक जिम्मेदारी और व्यक्तिगत नैतिकता के बीच के द्वंद्व को बारीकी से दिखाती है, लेकिन अपनी रफ्तार के कारण कहीं-कहीं फीकी पड़ जाती है।
फाइनल वर्डिक्ट
कुल मिलाकर, ‘एस्पिरेंट्स’ का तीसरा सीजन महत्वाकांक्षा के बजाय आत्म-मंथन पर केंद्रित है। यह दिखाता है कि सफलता जीवन को सरल नहीं, बल्कि और अधिक जटिल बना देती है। हालांकि पांच कड़ियों के इस सीजन की रफ्तार कहीं-कहीं धीमी पड़ती है और कुछ मोड़ अनुमानित लगते हैं। ड्रामा थोड़ा कम है और वैचारिक द्वंद्व ज्यादा, जिसके कारण शायद यह सीजन पहले भाग जैसा रोमांच न पैदा कर पाए। फिर भी यदि आप इस सीरीज के पात्रों से भावनात्मक रूप से जुड़े हैं तो यह सीजन आपको निराश नहीं करेगा। यह सत्ता के गलियारों में छिपे इंसानी चेहरों की एक ईमानदार कोशिश है।

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