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राधे मैं बिक गया

कुछ दिन पहले में अपने परिवार,मित्रो साथ जयपुर में शहर से दूर एक मंदिर दर्शन करने जा रहा था । रास्ते में मैने देखा एक बच्चा जमीन में बैठा रो रहा है,हमने गाड़ी रोकी ओर बच्चे के पास जाकर पूछा क्यों रो रहे हो,मुझको समझ आ रहा था कि ये शायद परिवार से बिछुड़ गया है ,बार बार पूछने पर उसने रोना बन्द किया और मेरी तरफ आस भरी नजरों से देखने लगा।


मेने पूछा,क्या बात है?,क्यों रो रहे हो ? क्या नाम है तुम्हारा? चेहरे पर असीम चमक वाला वो लड़का बोला मेरा नाम कृष्ण है,में परिवार से नही बिछुड़ा हूँ,में तो सदा परिवार में ही रहता हूँ, मुझे मजाक लगा उसका बोलना ओर उसको हंसाने के लिए मेने कहा ,की अगर तेरा नाम कृष्ण ही है तो चल हमारे साथ,अपने घर हम भी तेरे ही मन्दिर जा रहे है दर्शन करने। कान्हा रोने की आवाज़ में कहने लगा में तो सदा वही रहता था,पर आज मन्दिर छोड़ कर ,आ गया।क्या हाल कर दिया है मेरा इस मानव जाति ने।मेरा सहारा लेकर अपनी जीविका चलाता था तब तक तो ठीक था पर इसने तो आज हद ही करदी ,मुझे ही बेच दिया,मेरा उठना बैठना,सुबह का श्रृंगार,रात का श्रृंगार,आरती सुबह,की आरती शाम की सब बेच दिया।


सामने खरीदने वाला को हे कैसा है ,राम है रावण है ,इससे मतलब नही।चोरी -शिपे बेचता तब भी ठीक था पर हद तो ये करदी की मन्दिर में ही रेट लिस्ट लगा दी,जैसे कि मन्दिर बनाकर मुझे खरीद ही लिया हो ,घर दिया और अब आगे बेचा जा रहा हो ।इस काम मे उसको शर्म आयी हो या न आई हो पर मेंरा तो शर्म से मरने का मन करने लगा है,पर क्या करूँ,मर भी नही सकता इंसान की तरह। मेने कहा भाई इसकी शिकायत हमसे क्यों कर रहे हो ,वहां जाओ जिसने मानव बनाया है। कहने लगे गोपाल,वही से ही तो आ रहा हूं, ऐसी शिकायत करने वालो की वहां पहले से ही लाइन लगी हुई है।


ब्रह्मा,विष्णु,महेश कह रहे है कि बहुत बड़ी गक्ति करदी है ये इंसान बनाकर,अब तक तो अपने बच्चों,अपने माँ बाप को ही बेचता था,पर आज तो इसने भगवान को ही बेच दिया।कोन सा अवतार यहां नही बिकता किसी की माला बिकती है तो किसी का चोला पहनाने की बोली लगती है पैसा ही सब कुछ हो गया यहां पर। लोग अपना घर बनाते है तो मन्दिर के लिए थोड़ी जगह देते है,ओर जब मन्दिर मन्दिर बनाते है तो भी मुझे कम ही जगह मिलती है,बाकी पर पंडित जी का कब्जा।में तो जन्मों से ही तुम्हारे दिल मे रहता था पर तुम लोगो को कुछ ज्यादा ही चिंता है,जगह जगह मेरे मन्दिर बना देते हो।अगर इतना ही शोक है ,मुझसे प्यार है तो खरीदो अपनी जमीन और बना लो मन्दिर पर क्या करे,कब्ज़ा कर के बनाने कि जो खराब आदत है,पंडित जी को भी तो घर चाहिए,सरकार भी चुप क्योंकि मामला वोट का सरकार जो बचानी है।राजस्थान में मैने पौषबड़ा देखा है लोग बुला बुलाकर प्रशाद खिलाते है,मुफ्त में खिलाते है कही पदयात्रा निकलती है तो हजारों स्टाल कग जाती है मुफ्त में खाना ,फल बटता है ।हमारे हिंदुस्तान में तो प्रशाद मुफ्त शब्द का पर्यायर्वाची ही बन गया है पर मेरे इस कृष्ण मंदिर में प्रशाद भी बिकता है,ओर मंदिरों का तो पता नही पर हो भी सकता है। है मेरे मालिक इस युग के खत्म होने बाद फिर मानव न बनाना,पता नही क्या क्या बिकता देखना पड़े।


इन विचारों के लिए आपके विचार सादर आमंत्रित है।

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