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सिंधु नदी: पाकिस्तान की आर्थिक जीवनरेखा पर संकट

नई दिल्ली, 12 मई 2025: भारत द्वारा सिंधु जल संधि (Indus Waters Treaty) को स्थगित करने के फैसले ने पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था के लिए खतरे की घंटी बजा दी है। सिंधु नदी और इसकी सहायक नदियाँ पाकिस्तान की कृषि, ऊर्जा और जल आपूर्ति का आधार हैं, जिसे वहाँ की अर्थव्यवस्था की “जीवनरेखा” माना जाता है। भारत और पाकिस्तान के बीच 1960 में विश्व बैंक की मध्यस्थता में हस्ताक्षरित यह संधि दशकों तक दोनों देशों के बीच सहयोग का प्रतीक रही, लेकिन हाल के घटनाक्रम ने इसके भविष्य पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
सिंधु नदी का महत्व
सिंधु नदी प्रणाली, जिसमें सिंधु, झेलम, चिनाब, रावी, ब्यास और सतलुज नदियाँ शामिल हैं, पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था का आधार है। कुछ प्रमुख तथ्य:
कृषि पर निर्भरता: पाकिस्तान की 80% कृषि भूमि, यानी लगभग 1.6 करोड़ हेक्टेयर, सिंधु नदी के पानी पर निर्भर है। यह नदी 90% खाद्य उत्पादन को समर्थन देती है, जो देश के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का 24% और 37% रोजगार प्रदान करता है।
जलविद्युत उत्पादन: पाकिस्तान की 21 जलविद्युत परियोजनाएँ, जैसे तारबेला और मंगला बाँध, पूरी तरह से सिंधु बेसिन पर निर्भर हैं, जो देश की 19% बिजली की जरूरतों को पूरा करती हैं।
शहरी जल आपूर्ति: कराची, लाहौर और मुल्तान जैसे प्रमुख शहरों की पेयजल आपूर्ति और भूजल पुनर्भरण सिंधु नदी पर निर्भर है।
पाकिस्तान की 75% आबादी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कृषि पर निर्भर है, और सिंधु नदी इस क्षेत्र की रीढ़ है।
संधि स्थगन का कारण
22 अप्रैल 2025 को कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले, जिसमें 26 लोग मारे गए, के बाद भारत ने सिंधु जल संधि को स्थगित करने का फैसला किया। भारत ने इस हमले के लिए पाकिस्तान को जिम्मेदार ठहराया, जिसे पाकिस्तान ने “निराधार” करार दिया। इस फैसले के तहत भारत ने निम्नलिखित कदम उठाए:
जल डेटा साझा करना बंद: संधि के तहत दोनों देशों को नदी प्रवाह, बाढ़ चेतावनी और परियोजना विकास के डेटा साझा करने की आवश्यकता थी। भारत ने अब इस डेटा साझाकरण को रोक दिया है, जिससे पाकिस्तान के जल प्रबंधन पर असर पड़ सकता है।
नई परियोजनाओं की योजना: भारत अब पश्चिमी नदियों (सिंधु, झेलम, चिनाब) पर बाँध और जलाशय निर्माण को तेज कर सकता है, जो संधि के तहत सीमित था।
पाकिस्तान पर प्रभाव
संधि के स्थगन का तत्काल प्रभाव सीमित हो सकता है, क्योंकि भारत के पास अभी पश्चिमी नदियों के पानी को पूरी तरह रोकने या मोड़ने की बुनियादी ढांचा क्षमता नहीं है। विशेषज्ञों का कहना है कि भारत अधिकतम 5-10% जल प्रवाह को प्रभावित कर सकता है। हालांकि, मध्यम और दीर्घकालिक प्रभाव गंभीर हो सकते हैं:
कृषि संकट: पानी की कमी से गेहूँ, चावल, गन्ना और कपास जैसी प्रमुख फसलों का उत्पादन प्रभावित हो सकता है, जिससे खाद्य सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता खतरे में पड़ सकती है।
ऊर्जा संकट: जलविद्युत उत्पादन में कमी से बिजली की कीमतें बढ़ सकती हैं, जो पहले से ही 9 अरब डॉलर के “सर्कुलर डेट” से जूझ रहे ऊर्जा क्षेत्र को और प्रभावित करेगा।
सामाजिक अशांति: पानी की कमी से ग्रामीण क्षेत्रों में बेरोजगारी और शहरी क्षेत्रों में जल संकट बढ़ सकता है, जिससे सामाजिक अस्थिरता का खतरा है।
पाकिस्तान ने इस कदम को “पानी का युद्ध” करार दिया है और इसे “युद्ध की कार्रवाई” के रूप में देखा जा रहा है।
भारत की स्थिति
भारत का कहना है कि संधि को स्थगित करने का निर्णय “परिस्थितियों में मूलभूत परिवर्तन” के कारण लिया गया, जिसमें जनसंख्या वृद्धि, स्वच्छ ऊर्जा की आवश्यकता और जलवायु परिवर्तन शामिल हैं। भारत ने पहले 2023 और 2024 में संधि को संशोधित करने की माँग की थी, जिसे पाकिस्तान ने ठुकरा दिया था।
हालांकि, भारत के पास बड़े पैमाने पर जल भंडारण या डायवर्जन के लिए बुनियादी ढांचा विकसित करने में समय लगेगा। विशेषज्ञों का कहना है कि नई परियोजनाओं को पूरा होने में 2032 या उससे अधिक समय लग सकता है। इसके अलावा, भारत को अपनी ही निचले इलाकों में बाढ़ और पर्यावरणीय जोखिमों का सामना करना पड़ सकता है।
विश्व बैंक की भूमिका
विश्व बैंक, जिसने 1960 में संधि की मध्यस्थता की थी, ने कहा है कि वह “संधि से संबंधित संप्रभु निर्णयों” पर कोई राय नहीं देता। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि संधि को एकतरफा रद्द करना संभव नहीं है, और पाकिस्तान इस मामले को अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (ICJ) में ले जा सकता है।
निष्कर्ष
सिंधु नदी प्रणाली पाकिस्तान की आर्थिक और सामाजिक स्थिरता का आधार है। भारत का संधि स्थगन का फैसला एक राजनयिक दबाव रणनीति हो सकता है, लेकिन इसके दीर्घकालिक परिणाम दोनों देशों के लिए जटिल हो सकते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि जल संकट से बचने के लिए पाकिस्तान को अपनी जल प्रबंधन नीतियों को मजबूत करना होगा, जैसे कि जल भंडारण क्षमता बढ़ाना और पानी की बर्बादी को कम करना। दूसरी ओर, भारत को क्षेत्रीय स्थिरता और अपनी अंतरराष्ट्रीय छवि को ध्यान में रखते हुए सावधानीपूर्वक कदम उठाने होंगे।

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