काकतालीय न्याय!
किसी ताड़ के पेड़ के नीचे कोई पथिक लेटा था और ऊपर एक कौवा बैठा था। कौवा उडा़ और उसके उड़ने के साथ ही ताड़ का एक पका हुआ फल नीचे गिरा। यद्यपि फल पक कर आपसे आप गिरा था तथापि पथिक ने दोनों बातों को साथ (कौवा के उड़ने और ताड़ फल गिरने) होते देख यही समझा कि कौवे के उड़ने से ही ताड़ फल गिरा। जहाँ दो बातें संयोग से इस प्रकार एक साथ हो जाती हैं वहाँ उनमें परस्पर कोई संबंध न होते दुए भी लोग उनमें संबंध समझ लेते हैं।
इसी तरह कौवा के बैठने से सूखी डाल टूटने के संयोग को देखने वाला समझता है कि कौवा के भार से डाल टूटी है।
सीधी में रेल आते-आते बहुत देर कर दी!
कुछ तो रेल से सफऱ के प्रस्थान करने के इंतजार में अनंत को प्रस्थान कर गए, कुछ बच्चे से बूढ़े हो गए! सीधी जिले में रेल आगमन कि रफ्तार, लाने कि क़ी गईं कोशिश दोनों में संबंध समझना पड़ेगा। 63 साल क़ी देरी से सीधी के सीमा (बघवार) पर सिटी बजाती रेल के आगमन कि झुक-झुक और जिम्मेदारों क़ी बक-बक सीधी वासियों को “काकतालीय न्याय” का दृष्टांत है।
भगीरथ (गंगा को धरती में लाने वाले) है नहीं कोई ललितपुर सिंगरौली रेल लाइन लाने का।
सत्ता पक्ष का प्रयास “आंख में धूल झोकने का रहा” विपक्ष की कोशिश “मूदहु आंख कतहुं कुछ नाहीं’
कुछ सांगठनात्मक संघर्ष सड़क में हुए “100 किलोमीटर कि सीधी से रीवा कि पदयात्रा”
उमेश तिवारी सीधी (म. प्र.)




