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इंस्टाग्राम फिल्टर वाले दौर में रिश्तों की अधूरी कहानी, इम्परफेक्ट प्यार में फिट हैं सिद्धांत और मृणाल

आज सिनेमाघरों में रिलीज हुई है। फिल्म में सिद्धांत चतुर्वेदी और मृणाल ठाकुर फिल्म में लीड रोल निभा रहे हैं। फिल्म मेट्रो सिटी के इम्परफेक्ट लव को पेश करती है।महानगर की भागदौड़, ऊंची इमारतें और चमक-धमक वाली लाइफस्टाइल के पीछे अक्सर कुछ ऐसी कहानियां दबी रह जाती हैं, जो साधारण तो हैं पर दिल के करीब होती हैं। आज सिनेमाघरों में दस्तक देने वाली फिल्म इसी साधारणपन को सेलिब्रेट करने की एक कोशिश है। सिद्धांत चतुर्वेदी और मृणाल ठाकुर की मुख्य भूमिकाओं वाली यह फिल्म आज के इंस्टाग्राम फिल्टर वाले दौर में बिना किसी बनावट के रिश्तों की सच्चाई तलाशने का प्रयास करती है। हालांकि अपनी तमाम खूबियों और संवेदनशील प्रदर्शन के बावजूद फिल्म कहीं-कहीं अपनी पकड़ खोती नजर आती है।

कहानी- दिखावे के दौर में दो ‘अधूरे’ लोगों का सफर
फिल्म की कहानी मुंबई जैसे व्यस्त महानगर में रहने वाले दो युवाओं रोशनी श्रीवास्तव (मृणाल ठाकुर) और शशांक शर्मा (सिद्धांत चतुर्वेदी) के इर्द-गिर्द बुनी गई है। यह एक ऐसी मिलेनियल लव स्टोरी है, जो प्यार के किसी भव्य सपने को नहीं दिखाती, बल्कि उन असुरक्षाओं की बात करती है, जिनसे आज का हर दूसरा युवा जूझ रहा है। शशांक एक सफल कॉरपोरेट कंपनी में काम करता है, लेकिन उसके व्यक्तित्व में एक गहरी हिचकिचाहट है। उसे “श” और “स” जैसे वर्णों के उच्चारण में परेशानी होती है। सुनने में यह एक छोटी सी समस्या लग सकती है, लेकिन एक प्रतिस्पर्धी कॉर्पोरेट जगत में, जहां संवाद ही सब कुछ है, यह कमी उसके आत्मविश्वास को भीतर से खोखला कर देती है। दूसरी ओर रोशनी है, जो एक नामी मीडिया एजेंसी में काम करती है। वह आधुनिक है, स्वतंत्र है, लेकिन अपने ‘लुक्स’ को लेकर एक गहरे कॉम्प्लेक्स की शिकार है। वह खुद को दुनिया की नजरों से छिपाकर रखने की कोशिश करती है, इस डर में कि कहीं लोग उसे उसकी कमियों के साथ स्वीकार न करें।दोनों के परिवार उन पर शादी का दबाव बना रहे हैं, लेकिन शशांक और रोशनी इस फैसले को टालते रहते हैं। उनका डर पार्टनर से ज्यादा खुद से है। उन्हें लगता है कि जब वे खुद को ही पसंद नहीं करते, तो कोई दूसरा उन्हें कैसे प्यार कर सकेगा? फिल्म का मुख्य आधार यही है कि कैसे ये दो इम्परफेक्ट लोग एक-दूसरे से मिलते हैं और धीरे-धीरे यह समझते हैं कि असली कनेक्शन तभी बनता है जब आप खुद को वैसा ही स्वीकार करते हैं जैसे आप हैं।

कैसा है अभिनय?
फिल्म का सबसे मजबूत पक्ष इसके लीड एक्टर्स की परफॉर्मेंस है। सिद्धांत चतुर्वेदी ने शशांक के किरदार में एक अलग तरह की परिपक्वता दिखाई है। उन्होंने शशांक की बोलने की समस्या को कैरीकेचर या मजाक नहीं बनने दिया, बल्कि इसे एक ऐसी कमजोरी के रूप में पेश किया जिससे दर्शक सहानुभूति महसूस करते हैं। उनकी बॉडी लैंग्वेज में दिखने वाली हिचकिचाहट और अपनी बात कहने से पहले का वह छोटा सा ठहराव, उनके अभिनय की गहराई को दर्शाता है। सिद्धांत ने साबित किया है कि वे केवल एक्शन या एग्रेसिव रोल ही नहीं, बल्कि एक दबे हुए और संवेदनशील युवक का किरदार भी बखूबी निभा सकते हैं।

मृणाल ठाकुर ने एक बार फिर अपनी अभिनय क्षमता का लोहा मनवाया है। रोशनी के किरदार में उन्होंने एक वर्किंग वुमन के बाहरी आत्मविश्वास और अंदरूनी संघर्ष के बीच के बारीक अंतर को बहुत खूबसूरती से पकड़ा है। मृणाल की खासियत उनकी आंखें हैं, कई गंभीर दृश्यों में जहां संवाद कम हैं, उनकी आंखें रोशनी के दर्द और उसकी असुरक्षा को बखूबी बयां कर देती हैं। सिद्धांत और मृणाल की स्क्रीन केमिस्ट्री बहुत ही ऑर्गेनिक लगती है। उनके बीच का रोमांस अचानक नहीं होता, बल्कि वह धीमी आंच पर पकने वाले उस एहसास की तरह है, जहां दो अजनबी धीरे-धीरे एक-दूसरे के कम्फर्ट जोन बन जाते हैं।

संदीपा धर का रोल छोटा है, लेकिन वे अपनी स्क्रीन प्रेजेंस से प्रभावित करती हैं। वहीं, अनुभवी इला अरुण ने अपनी सहज अदाकारी से कहानी में एक ऐसी गर्माहट जोड़ी है, जो अक्सर शहरी कहानियों में गायब रहती है। उनके हिस्से के दृश्य फिल्म को एक पारिवारिक गहराई देते हैं।

निर्देशन और तकनीकी पक्ष
निर्देशक ने मुंबई को सिर्फ एक बैकग्राउंड के तौर पर इस्तेमाल नहीं किया है, बल्कि इसे एक पात्र की तरह कहानी में पिरोया है। फिल्म मुंबई की उन लोकल ट्रेनों, ट्रैफिक और छोटी गलियों के शोर से शुरू होती है जहां हर कोई किसी न किसी रेस में दौड़ रहा है। निर्देशक का विजन यहां स्पष्ट है, वे दिखाना चाहते हैं कि कैसे यह शहर लोगों को अपनी पहचान बदलने या उसे छिपाने पर मजबूर कर देता है। फिल्म का डायरेक्शन काफी हद तक रियलिस्टिक है। निर्देशक ने क्लासिक रोमांटिक फिल्मों की सॉफ्ट फीलिंग और आज के दौर की कड़वी हकीकत के बीच एक संतुलन बनाने की सफल कोशिश की है। संवाद बहुत ही नैचुरल हैं और ऐसे लिखे गए हैं कि आज की युवा पीढ़ी उनसे तुरंत जुड़ सके। फिल्म के दृश्य जब मुंबई की अफरा-तफरी से निकलकर पहाड़ों की शांति की ओर बढ़ते हैं तो वह न केवल एक विजुअल बदलाव है, बल्कि किरदारों की आंतरिक यात्रा का भी प्रतीक है। सिनेमैटोग्राफी और बैकग्राउंड म्यूजिक फिल्म के मूड को सपोर्ट करते हैं और इसे एक ‘फील गुड’ अनुभव बनाते हैं। ये फिल्म आज के दौर के लोगों और मेट्रो सिटी के लोगों के लिए है। वो ही इससे रिलेट कर पाएंगे। हां, छोटे शहरों के लोगों के लिए ये भागदौड़ भरी जिंदगी को समझना मुश्किल होगा, लेकिन दूर-दराज के इलाकों से मुंबई-दिल्ली में आकर बसे लोगों के लिए ये फिल्म एक फीस्ट हो सकती है।

कमी कहां रह गई?
इतनी संवेदनशीलता और अच्छे प्रदर्शन के बावजूद फिल्म में कुछ ऐसी कमियां हैं जो इसे एक मास्टरपीस बनने से रोकती हैं। फिल्म की पेसिंग कई जगहों पर बहुत सुस्त हो जाती है। विशेष रूप से सेकेंड हाल्फ की कहानी में, फिल्म एक ही जगह घूमती नजर आती है। भावनाओं को गहराई देने के चक्कर में निर्देशक ने कुछ दृश्यों को जरूरत से ज्यादा खींच दिया है, जिससे औसत दर्शक का ध्यान भटक सकता है। हालांकि यह एक स्लाइस-ऑफ-लाइफ फिल्म है, लेकिन इसकी कहानी बहुत हद तक प्रेडिक्टेबल है। दर्शक पहले से ही अंदाजा लगा सकते हैं कि अंत में क्या होने वाला है। कहानी में किसी बड़े ट्विस्ट या सरप्राइज की कमी खलती है। कुछ किरदारों का अधूरापन दिखता है। मुख्य किरदारों पर इतना ध्यान दिया गया है कि कुछ सहायक पात्रों जैसे शशांक के ऑफिस के साथी या रोशनी के दोस्त को बहुत ही सतही तरीके से दिखाया गया है। यदि उनके नजरिए को भी थोड़ा और विस्तार दिया जाता तो महानगरीय अकेलेपन की तस्वीर और भी साफ होती।

फाइनल वर्डिक्ट
यह फिल्म हमें एक बहुत ही महत्वपूर्ण सबक सिखाती है, खुद से प्यार करना और किसी और से प्यार करने से ज्यादा जरूरी है और किसी और प्यार में पड़ने के लिए पहले खुद से प्यार करना जरूरी है। यह फिल्म उन सभी लोगों के लिए है जो खुद को दूसरों से कम आंकते हैं या जिन्हें लगता है कि उनकी कमियां उन्हें प्यार के काबिल नहीं बनातीं। यह दिखाती है कि सच्चा प्यार वह नहीं है जो आपको परफेक्ट बनाने की कोशिश करे, बल्कि वह है जो आपकी खामियों के साथ आपको गले लगा ले। रोशनी और शशांक की यह कहानी मुंबई की भागदौड़ भरी जिंदगी में एक ठंडी फुहार की तरह है। भले ही इसमें कुछ तकनीकी खामियां और सुस्त रफ्तार हो, लेकिन इसकी नीयत और संदेश पूरी तरह से ईमानदार हैं। यदि आप मार-धाड़ और शोर-शराबे वाली फिल्मों से अलग एक शांत, इमोशनल और अपनी सी लगने वाली कहानी देखना चाहते हैं तो यह फिल्म आपके लिए है। सिद्धांत और मृणाल की बेहतरीन अदाकारी के लिए इसे एक बार थिएटर में जरूर देखा जा सकता है।

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