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पाकिस्तान में तक्षशिला के पास से मिले दुर्लभ सिक्के और सजावटी पत्थर, पुरातत्वविदों ने बताया अहम खोज

पाकिस्तान में तक्षशिला के पास से खुदाई के दौरान दुर्लभ सजावटी पत्थर और सिक्के मिले हैं। पुरातत्वविदों ने इस खोज को एक दशक में सबसे अहम खोज बताया है। सिक्कों पर सम्राट वासुदेव की छवि है।इस्लामाबाद: पाकिस्तानी पुरातत्वविदों को ऐतिहासिक शहर तक्षशिला के पास यूनेस्को-सूचीबद्ध स्थल की खुदाई के दौरान दुर्लभ सजावटी पत्थर और सिक्के मिले हैं। सिक्के और अन्य वस्तुओं के मिलने से प्राचीन सभ्यता की शहरी बस्ती के प्रमाण मिले हैं। ये खोजें प्राचीन भीर टीले पर की गई हैं। यहां से विशेषज्ञों को छठी शताब्दी ईसा पूर्व के सजावटी पत्थर और दूसरी शताब्दी ईस्वी के सिक्के मिले हैं।
एक दशक की सबसे अहम खोज
डॉन अखबार की रिपोर्ट के अनुसार अधिकारियों ने इसे एक दशक में साइट पर सबसे महत्वपूर्ण खोज बताया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि विशेषज्ञों ने
के रूप में पहचाने गए सजावटी पत्थर के टुकड़े, कुषाण वंश के दुर्लभ कांस्य सिक्कों के साथ खोजे हैं। पंजाब पुरातत्व विभाग के उप निदेशक आसिम डोगर, जो खुदाई टीम के प्रमुख हैं, ने कलाकृतियों के प्रारंभिक विश्लेषण की पुष्टि की है। डोगर ने कहा, “सजावटी पत हैं, जो एक कीमती पत्थर है, जबकि सिक्के कुषाण काल ​​के हैं।”
सिक्कों पर सम्राट वासुदेव की छवि
खुदाई टीम ने धातु की कलाकृतियों की तारीख तय करने के लिए फोरेंसिक जांच की सहायता ली है। डोगर ने बताया कि पेशावर विश्वविद्यालय के विशेषज्ञों द्वारा किए गए विस्तृत विश्लेषण ने पुष्टि की है कि सिक्कों पर सम्राट वासुदेव की छवि है। इतिहासकार वासुदेव को इस क्षेत्र पर शासन करने वाले महान कुषाण शासकों में से अंतिम मानते हैं। डोगर के अनुसार, बरामद सिक्कों के एक तरफ वासुदेव को दर्शाया गया है, जबकि दूसरी तरफ एक देवी की छवि है। उन्होंने इस विशिष्ट इमेजरी को कुषाण युग के धार्मिक बहुलवाद की एक विशिष्ट पहचान बताया।

तक्षशिला के बारे में मिल रही अहम जानकारी
कलाकृतियां पुरातात्विक अवशेषों के उत्तरी तरफ, विशेष रूप से B-2 खाई के भीतर पाई गईं – जो साइट पर वर्तमान में खोदी जा रही 16 अलग-अलग खाइयों में से एक है। डोगर ने कहा कि आसपास के पुरातात्विक साक्ष्य बताते हैं कि ये विशिष्ट अवशेष एक आवासीय क्षेत्र थे। ये नवीनतम खोजें इस बात की पुष्टि करती हैं कि कुषाण शासन के तहत, विशेष रूप से पहली और तीसरी शताब्दी ईस्वी के बीच, तक्षशिला अपने राजनीतिक, सांस्कृतिक और आर्थिक प्रभाव के चरम पर पहुंच गया था।
गांधार कला का मुख्य केंद्र था तक्षशिला
डोगर ने कहा, “कनिष्क जैसे महान सम्राटों की वजह से तक्षशिला एक प्रमुख प्रशासनिक, वाणिज्यिक और बौद्धिक केंद्र के रूप में उभरा।” उन्होंने कहा कि इस युग के दौरान बौद्ध धर्म को कुषाणों का संरक्षण मिला जिससे स्तूपों, मठों और विशाल धार्मिक परिसरों का निर्माण हुआ। इस दौर में गांधार कला का भी उदय हुआ, जो ग्रीक, रोमन, फारसी और भारतीय परंपराओं का एक खास मेल था, और तक्षशिला इसका मुख्य केंद्र था।

अहम व्यापारिक केंद्र था तक्षशिला
डोगर ने बताया कि पत्थर को हजारों सालों से प्राचीन सभ्यताओं में महत्व दिया गया है। डोगर ने कहा, “तक्षशिला में इसकी उपस्थिति लंबी दूरी के व्यापार संबंधों की ओर इशारा करती है, खासकर आज के अफगानिस्तान में बदख्शां के साथ, जो का एक ऐतिहासिक स्रोत है।”
क्या बोले जाने-माने सिक्का विशेषज्ञ?
जाने-माने सिक्का विशेषज्ञ मलिक ताहिर सुलेमान ने डॉन को बताया कि कुषाण सिक्के प्राचीन दक्षिण और मध्य एशिया को समझने के लिए कुछ सबसे जरूरी ऐतिहासिक स्रोत हैं। सुलेमान ने कहा, “पहली और चौथी शताब्दी ईस्वी के बीच जारी किए गए कुषाण सिक्के इंडो-ग्रीक नकल से एक परिष्कृत शाही मुद्रा प्रणाली में विकसित हुए।” “मुख्य रूप से सोने, तांबे और कांसे में ढाले गए, वो साम्राज्य की आर्थिक ताकत और विशाल व्यापार नेटवर्क को दर्शाते हैं, जिसमें रोमन बाजारों के साथ संबंध भी शामिल हैं।” सुलेमान ने कहा कि कुषाण सिक्कों की पहचान उनकी समृद्ध चित्रकला और बहुभाषी शिलालेखों से होती है।

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