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जयपुर, 21 मार्च 2025, मोदी की गारंटी होते हुए भी किसान को न्यूनतम समर्थन मूल्य से वंचित रहना पड़ रहा है । दूसरी ओर किसान हितेषी होने का दम भरने वाली पंजाब सरकार एवं उनके दल के मुखिया द्वारा आंदोलनकारियो की गिरफ्तारी सहित अन्य सभी कार्यवाहियों को सही एवं उचित कदम ठहराने वाले उनके वक्तव्यों ने उनके चेहरों से किसान हितैषी आवरण को हटा दिया है ।
यद्यपि आंदोलनकारी केंद्र सरकार के समक्ष अपनी व्यथा प्रकट कर रहे हैं । जिसमें प्रमुख विषय संपूर्ण देश के किसानों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीद की गारंटी का कानून बनाना है । पंजाब सरकार तथा उनके दल के नेताओं द्वारा इस तथ्य को अनदेखा किया जा रहा है कि कृषि एवं किसान कल्याण पर कानून बनाने का दायित्व संविधान में राज्यों को सौप हुआ है । इसी आधार पर एक राष्ट्र एक कानून के अंतर्गत वर्ष 2020-21 में पंजाब विधानसभा में गेहूं एवं धान के न्यूनतम समर्थन मूल्य की गारंटी का विधेयक पारित किया गया था, जो राष्ट्रपति के अनुमोदन के अभाव में अटक गया था । यही कार्य पंजाब कृषि उपज मंडी कानून में संशोधन के द्वारा किया जाता तो उसके कानून बनने की संभावना बलवती रहती क्योंकि पंजाब कृषि उपज मंडी कानून को राष्ट्रपति का अनुमोदन प्राप्त है ।
इसी के संबंध में किसान महापंचायत की ओर से देश के अन्य सभी मुख्यमंत्री के साथ पंजाब के मुख्यमंत्री माननीय श्री भगवत मान को 28 मार्च 2022 एवं 31 मई2022 को पत्र प्रेषित कर अनुरोध किया गया था । जिसे लगभग 3 वर्ष का समय व्यतीत हो चुका है । यह स्थिति तो तब है जब किसानों द्वारा ही आम आदमी पार्टी को पंजाब सरकार की कमान सौंपी गई थी । केंद्र सरकार को बाध्य करने के लिए इस प्रकार का कानून किसानों के कल्याण के साथ देश की समृद्धि के लिए भी प्रासंगिक एवं सामयिक है । पंजाब सरकार द्वारा इस दिशा में कार्यवाही नहीं कर इसके विपरीत उन्होंने केंद्र सरकार की सहायता करने को अपनी रणनीति का अंग बनाया है । इससे पंजाब सरकार एवं उनके दल के नेताओं के चेहरों से किसान हितेषी होने का पर्दा हट गया है । इससे ‘हाथी के दांत खाने के और दिखाने के और’ वाली कहावत चरितार्थ हो रही है ।
न्यूनतम समर्थन मूल्य पर गारंटी का कानून बनाना देश भर के किसानों के हृदय की पुकार है, जिसके लिए देशभर के किसान एकमत है । यह मोदी की गारंटी को सफल करने का भी एकमेव मार्ग है । देश के प्रधानमंत्री की गारंटी का सफल होना विश्व भर में देश की साख के लिए एक अपरिहहार्य है । इसके अभाव में किसानों को अपनी उपज घोषित न्यूनतम समर्थन मूल्य से 500 से लेकर 3500 रुपए प्रति क्विंटल का घाटा उठाकर बेचने को विवश होना पड़ रहा है ।
अंतरराष्ट्रीय आर्थिक संबंधों पर भारतीय अनुसंधान परिषद के आकलन के अनुसार वर्ष 2000 – 01 से 2016 -17 तक न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम दामों में अपनी उपज बेचने के कारण किसानों को 45.05 लाख करोड रुपए का घाटा उठाना पड़ा है । इसके अनुसार प्रतिवर्ष खेती की लागत से 14% दाम कम प्राप्त हुए हैं यानि सरकार ने किसानो की जेब से अनुदान छीना है, जिसे नकारात्मक अनुदान कहते हैं ।
उल्लेखनीय है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य पर गारंटी का कानून बनाने का सविधान में राज्यों को अधिकार सौपा हुआ है । लोकहित में राज्य सभा या न्यूनतम दो विधान मंडलों द्वारा संकल्प पारित करने के उपरांत संसद को भी इस प्रकार का कानून बनाने का अधिकार प्राप्त हो जाता है । केंद्र एवं राज्य सरकारे इस विषय पर राजनीति ? करना छोड़े, अच्छा हो दोनों मिलकर जी एस टी की भांति इस प्रकार का कानून बनाने की पहल करे । इस प्रकार के कानून बनाने के लिए वार्ताओ की भी आवश्यकता नही है क्योकि भारत सरकार के ही आयोगों एवं समितियों ने अनुशंशाए की हुई है । यथा – 12 जुलाई 2022 को गठित समिति के न्यूनतम समर्थन मूल्य सबंधी उपसमूह ने 21 अप्रैल 2023 को न्यूनतम समर्थन मूल्य को आरक्षित मूल्य घोषित करने एवं न्यूनतम समर्थन मूल्य से ही मंडियों में नीलामी बोली आरम्भ करने की अनुशंषा की हुई है ।

गोलाप सैनी
कार्यालय सचिव

सलग्न पंजाब के मुख्यमंत्री को 28 मार्च 2022 को प्रेषित पत्र ।

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