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ब्रिक्स में पहले ज्यादा मजबूत हुआ है चीन

संजीव पांडेय

दक्षिण अफ्रीका में ब्रिक्स की 15 वीं शिखर बैठक संपन्न हो गई। दक्षिण अफ्रीका के शहर जोहानिसबर्ग में हुई बैठक में 6 नए सदस्य ब्रिक्स से अब और जुड़ गए है। चीन, रूस, भारत, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका का समूह ब्रिक्स में अब 6 नए सदस्यों का आगमन ने निश्चित तौर पर अमेरिकी औऱ उसके सहयोगी देशों की जियोपॉलिटिक्स को खासी चुनौती दी है, हालांकि नए सदस्यों के चयन ने ब्रिक्स के आंतरिक ढांचा को प्रभावित किया है, जिसमें चीन मजबूत होकर उभरा है, भारत कमजोर हुआ है। नए शामिल किए गए सदस्य देशों में ज्यादातर देश इस समय चीन के प्रभाव में है, जहां चीन निवेश कर रहा है, चीन इनके आपसी विवाद में मध्यस्थता कर रहा है। नए सदस्य देश में शामिल सऊदी अरब, ईऱान इस समय पूरी तरह से चीन प्रभाव में है। संयुक्त अरब अमीरात, इथोपिया, मिश्र और अर्जेंटीना चीन के आर्थिक निवेश से प्रभावित है। निश्चित तौर पर इन देशों के आने से ब्रिक्स के अंदर चीन मजबूत हुआ और भारत की स्थिति कमजोर हुई है। हालांकि ब्रिक्स के अंदर चीन की मजबूती रूस को पसंद नहीं है, लेकिन फिलहाल यूक्रेन युद के कारण रूस की अपनी मजबूरी है। रूस भी ब्रिक्स में चीन के बढते प्रभाव से प्रसन्न नही है, लेकिन यूक्रेन युद के कारण फंसा रूस फिलहाल चीन से ज्यादा नाराजगी मोल नहीं ले सकता है। भारत की चिंता इस समय ज्यादा बढी है, क्योंकि भारत औऱ चीन के बीच संबंध इस समय बुरे दौर से गुजर रहा है, लद्दाख के कुछ इलाके में घुसपैठ कर चुका चीन इलाके को खाली करने को राजी नहीं है। वैसे में चीन का ब्रिक्स के अंदर मजबूत होना भारत के लिए अच्छे संकेत नही है। 

ब्रिक्स के उद्देश्य को लेकर तमाम आशंकाएं व्यक्त की जा रही है। इसे आपसी सहयोग से मजबूत कर अमेरिकी आर्थिक ताकत विकल्प करने को लेकर तमाम सवाल उठे हुए है, क्योंकि चीन के इसके सदस्य देश भारत से संबंध काफी खराब है। अमेरिकी और उसके सहयोगी देशों के प्रभाव को कम करने और उसे संतुलित करने के लिए ब्रिक्स का इस्तेमाल चीन और रूस ने किया है, लेकिन इसकी सफलता कितनी होगी इसका आकलन इस समय मुश्किल है। शीत युद खत्म होने के बाद अमेरिका के एकछत्र प्रभाव को 2000 के बाद चीन ने चुनौती दी। धीरे-धीरे रूस भी चीन का सहयोगी बन गया। ब्रिक्स का इस्तेमाल इसी उद्देश्य के लिए किया गया। लेकिन ब्रिक्स की स्थापना के कई सालों बाद ब्रिक्स की सफलता पर संदेह व्यक्त किया जा रहा है, क्योंकि चीन इसमें अपने एजेंडे को लागू कर रहा है और अमेरिका चीन को अलग-थलग करने की पूरी कोशिश कर रहा है। अमेरिका चीन और रूस को अलग-अलग मोर्चे पर संतुलित कर रहा है जिसमें महत्वपूर्ण मोर्चा यूक्रेन और ताइवान है। अमेरिका ने यूक्रेन के मोर्चे पर रूस को खासा उलझा दिया है, वहीं चीन पर दबाव बनाने का प्रयास अमेरिका कर रहा है। चीन की बढती आर्थिक ताकत को कमजोर करने के लिए ताइवान की खुली मदद अमेरिका शुरू कर चुका है। वहीं तकनीकी सेक्टर में अमेरिका ने चीन पर कई प्रतिबंध लगा दिए है। वैसे मे ब्रिक्स अमेरिकी ताकत को संतुलित करने में कितना कामयाब होगा यह समय बताएगा। 

ब्रिक्स का मजबूत सदस्य देश भारत का संबंध चीन से खासा खराब है। वैसे में ब्रिक्स के विस्तार में चीन ने काफी सावधानी बरती है और अपनी स्थिति मजबूत की है। हालांकि ब्रिक्स की सदस्यता के लिए 40 से ज्यादादेशों ने देशों ने इच्छा व्यक्त की थी, लेकिन चीन ने काफी समझदारी से उन देशों को सदस्यता दिलाने में मदद की, जिन देशों में इस समय चीन आर्थिक निवेश की योजना बना रहा है। सऊदी अरब, ईऱान से लेकर मिश्र तक चीन की निवेश की तरफ देख रहे है। उधर सऊदी अऱब अमेरिकी प्रभाव से निकल पश्चिम एशिया की जियोपॉलिटिक्स को निर्धारित करना चाह रहा है और चीन की मध्यस्थता के सहारे अपने पुराने दुश्मन ईरान से संबंध सुधारने की कोशिश कर रहा है। एक रणनीति के तहत चीन ने दोनों देशो को ब्रिक्स की सदस्यता दिलवायी है। गौरतलब है कि भारत का परंपरागत समर्थक ईऱान पिछले कुछ सालों से भारत से नाराज है, क्योंकि अमेरिकी दबाव में भारत ने ईऱानी तेल खरीदना बंद कर दिया। दक्षिण अफ्रीकी देश इथोपिया और मिश्र को ब्रिक्स में शामिल कर चीन ने अपनी अफ्रीकी कुटनीति स्पष्ट कर दी है। कई अफ्रीकी देशों में चीन ने पहले ही अऱबों डालर का निवेश कर उन्हें अपने कर्ज के जाल में फंसा लिया है। अफ्रीका मे चीन निवेश बढ़ाने के प्रभाव में है। ब्रिक्स के माध्यम से रूस भी अफ्रीका में और मजबूत होना चाहता है। रूस की प्राइवेट आर्मी ग्रुप वैगनर पहले से ही अफ्रीका के कुछ देशों में मौजूद है जो वहां के शासकों को सहयोग दे रहा है, वहां कई प्रतिष्ठानों को सुरक्षा प्रदान कर रहा है औऱ धन अर्जित कर रहा है। 

ब्रिक्स की दक्षिण अफ्रीका मे हुई बैठक में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी पहुंचे थे। इस बार भारत ब्रिक्स के अंदर थोड़ा कमजोर इसलिए भी हुआ कि इसके एक सदस्य देश ब्राजील के अँदर सत्ता परिवर्तन हो गया है और वहां लेफ्ट ग्रुप के लूला  डि सिल्वा राष्ट्रपति निर्वाचित हुए है जो वैचारिक रूप से चीन के ज्यादा नजदीक है। दक्षिण अफ्रीकी राष्ट्रपति सिरिल रामफोसा ने भी भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से ज्यादा महत्व चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग को दिया। वे खुद चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग को एयरपोर्ट पर आगवानी की। जबकि भारतीय प्रधानमंत्री को एय़रपोर्ट पर दक्षिण अफ्रीका के उप राष्ट्रपति ने प्रधानमंत्री मोदी की आगवानी की। निश्चित तौर पर अफ्रीकी देश भारत और चीन दोनों की आर्थिक ताकत निवेश की क्षमता का आकलन कर रहे है। अफ्रीकी देशों को लगता है कि अफ्रीका के अंदर निवेश की क्षमता चीन के पास ही है। इसलिए अफीकी देशों का झुकाव चीन की तरफ ही है। 

हालांकि ब्रिक्स संगठन भविष्य में कितना सफल रहेगा यह समय बताएगा। ब्रिक्स के दो सदस्य देश चीन औऱ रूस के अंदर लोकतंत्र का घोर आभाव है। रूस यूक्रेन के मोर्चे पर बुरी तरह से फंसा हुआ है। यूक्रेन में उम्मीद से कम सफलता ने पुतिन की वैश्विक स्थिति कमजोर कर दी है। रूस में वैगनर ग्रुप के विद्रोह ने भी पुतिन की छवि खराब की है। वहीं मध्य एशिया के देशों को लेकर चीन औऱ रूस के बीच आपसी टकराव है। मध्य एशिया के देश अभी तक रूसी प्रभाव में रहे है जहां चीन धीरे—धीरे अपने पांव को मजबूत कर रहा है। यही कारण है कि चीन को ब्रिक्स के अंदर संतुलित रखने के लिए रूस भारत का सहयोग ले रहा है। हालांकि ब्रिक्स के सदस्य ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका कई कारणों के कमजोर हो रहे है।  ब्राजील पिछले कुछ सालों में आर्थिक रूप से कमजोर हुआ है और यही हाल दक्षिम अफ्रीका का है। वैसे में ब्रिक्स के अंदर चीन के साथ चलना इनकी मजबूरी होगी।

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