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कुचले हुए इंसान के हाथ में सूरज

बिबेक देबरॉय पीएमओ की आर्थिक सलाहकार परिषद के चेअरमेन हैं.  यानी उनका असली काम देश की माली हालतों पर मोदी को ज्ञान देना है.  भूत की तरह पसर रही महंगाई,  बेरोज़गारी के जिन्न को बोतल में उतारना है.  पर यह काम उन्हें नहीं आ रहा है.  इसलिए अपने आका को खुश करने के लिए वे संविधान को बदलने की वकालत में लग गए हैं. देबरॉय को लगता है सड़कों, संस्थाओं, संसद को बदलने वाली सरकार देश का  संविधान भी बदल सकती है. 

देबरॉय भूल गए हैं कि संविधान ही इस देश की वह ताकत है, जिसने राजा को  रंक के दरवाजे पर लाकर खड़ा किया है.  रोशनी के एक कतरे के लिए तरस रहे सदियों से कुचले जा रहे इंसान  के हाथ में सूरज थमा दिया. यह करिश्मा डा. भीमराव आंबेड़कर का है, तो डा. राजेंद्रप्रसाद समेत वह तमाम दिग्गज नेता हैं , जिन्होंने गुलाम भारत की बेडियों का दर्द अपने सीने में सहते हुए आज़ाद भारत का सपना देखा है.  उस वक्त के नेताओं की उंचाइयां देखिए- संविधान का मसविदा बाकायदा जनता के  बीच रायशुमारी के लिए रखा गया.  जनता की ताकत से इसे पूरा किया गया.

उस संविधान को देबरॉय किस हैसियत से बदलने की पैरवी कर रहे हैं ?  इसे औपनिवेशिक विरासत बता रहे हैं,  समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक न्याय, स्वतंत्रता, समानता जो संविधान की सबसे अह् म बाते हैं उसके आज के दौर में मायने पूछ रहे हैं ?   यह उस डा. आंबेड़कर का अपमान है. जिन्होंने  अपनी खराब सेहत से जूझते हुए लगातार तीन साल तक उस देश के संविधान में अपनी आत्मा फूंकी. जो भारी असमानता, गरीबी, छुआछूत , सांप्रदायिकता के दलदल में फंसा हुआ था.  संविधान को तैयार करने वाली कमेटी के बीच तमाम सवर्ण नेताओं को जिनमें प. नेहरू भी थे,  स्वीकार करना पड़ा कि इस काम का एकमात्र श्रेय किसी को जाता है तो वे डा. आंबेडकर हैं.  डा. देबरॉय इसकी परछाई तक महसूस नहीं कर सकते.

यह तो  जनता जर्नादन है,  जिसने ट्विटर पर देबरॉय को गिरफ्तार करो जैसे हैशटैग चलाएं. बसपा सुप्रीमो मायावती ने मैदान पकड़ा और जमकर आरोप लगाया कि यह बंद दिमाग, जातिवादी, धन्नासेठों के खास लोगों का षड़्यंत्र है. संविधान 140 करोड़ गरीब, पिछड़ी, उपेक्षित जनता के लिए मानवतावादी समतामूलक होने की ग्यारंटी है.

 जिसके चलते दो दिन में ही  पीएमओ की पूरी पेनल को  देबरॉय के इस बयान से खुद को अलग – थलग करना पड़ा. जब देश 77 वीं आज़ादी का जश्न मना रहा है, तब देबरॉय को 2047 के लिए नए संविधान की वकालत क्यों कर रहे हैं? यह बात कहीं और से आती दिख रही है, जो अभी खारिज हुई है, लेकिन दफन नहीं.

 देश में बहुत कुछ चल रहा है. चौंकाने वाले खुलासे हो रहे हैं.  देबरॉय जिनका संविधान से कोई लेना – देना नहीं है. ऐसे ही एक भाजपा के करीबी एनआरआई शख्स हैं- शरद मराठे जिनके कारण देश में  कृषि कानूनों में बदलाव को लेकर एक साल तक भारी भरकम आंदोलन हुआ,  650 से ज्यादा  किसानों की मौत हुई. इसके पीछे शरद मराठे का खेल था. जो खेती को कार्पोरेट के हवाले करना चाहते थे. नीति आयोग ने इनके प्रस्ताव पर एक टास्क फोर्स बनाया. जिसमे एक भी किसान संगठन को शामिल नहीं करते हुए, अदाणी, महिन्द्रा, आईटीसी, पतंजलि, बिग बास्केट जैसे घरानों को जगह दी गई. खेती के समर्थन मूल्य से बाहर करते हुए  मंडियों को खुले बाजार में बदलने, खेती की जमीन को कार्पोरेट के हवाले करने जैसे प्रस्ताव तैयार किए गए. कांट्रेक्ट खेती के रास्ते खोले गए.  जिसमे विवाद का निपटारा एसडीएम स्तर पर करने और न्यायालय का रास्ता बंद करने के प्रावधान रखे गए.   किसान अपनी जमीन और उपज पर हुए हमले को भांप गए. जिसके चलते  मोदी सरकार को बेकफुट पर आना पड़ा.  रिपोर्टस कलेक्टिव की यह रिर्पोट सरकार के उस तंत्र की पोल खोलती है. जहां गरीब किसान की आवाज़ को बेरहम हालातों पर छोड़ने में कोई कसर बाकी नहीं रखी गई थी.  

तीसरा मामला  डर के माहौल और सेंसरशिप से जुड़ा है. पढ़ाई- लिखाई में अपनी उंचाइयों के लिए पहचान रखने वाली अशोका यूनिवर्सिटी में कहने की आज़ादी के नाम पर जंग छिड़ी हुई है.

वहां के प्रोफेसर सवस्याची दास ने भाजपा की  2019  के लोकसभा चुनावी जीत  का आकलन कर अपने रिसर्च पेपर में  धांधली की संभावना बताई  है.  12 करोड़ मुस्लिम और दलित वोट गायब किए गए  हैं. यह रिसर्च सोशल मीडिया में बाहर आने के बाद छिड़े विवाद में दास ने प्रबंधन के दबाव मे नौकरी छोड़ दी है.  वहीं अर्थशास्त्र विभाग के एक और प्रोफेसर ने डर का माहौल बताकर इस्तीफा दे दिया है. वहीं देश भर के 80 संस्थानों के तमाम प्रोफेसर्स, दिग्गज दास के समर्थन में आ गए हैं.  यूनिवर्सिटी पर दास को फिर से बहाल करने का दबाव  बनाया जा रहा है.

इसी तरह पेशेवर कोचिंग इंस्टीट्यूट चलाने वाली अनएकडमी के प्रोफेसर करण सांगवान को बर्खास्त कर दिया गया है. सांगवान ने अपनी क्लास के दौरान छात्रों से अपील की थी कि वे पढ़े- लिखे उम्मीदवार को ही  वोट दे. दरअसल ज्यूडिशियल सर्विसेज एग्जाम की तैयारी में करने वाले छात्रों को परेशानी का जिक्र कर उन्होने कहा था कि सिर्फ ऐसे इंसान को न चुने जिन्हें सिर्फ बदलना आता हो. नाम बदलना आता हो. इस घटना को आईपीसी की धारा में हुए बदलाव को जोड़कर देखा गया. और संगवान बाहर हो गए.

दिल्ली अध्यादेश के बाद डाटा प्रोटेक्शन की आड़ में सरकार की ताकत बढ़ने का मामला है. जिसमे देश के हित का हवाला देकर किसी भी खबर को रोका जा सकता है. आरटीआई  के आवेदनों को रद्द करने की ताकत है, वहीं सूचना के अधिकार को खत्म करने की क्षमता है.

इन तमाम हालातों से सामना कर रहे देश में 26 संगठनों का इंडिया कहां पर है?  कभी पटना तो कभी बेंगलुरु  में अपनी चमकदार मौजूदगी दिखाने वाले विपक्ष की  इन तमाम मुद्दों पर  जैसे गैर मौजूदगी है.  संविधान बदलने की वकालत हो रही है, कृषि कानूनों को लेकर भांडा फूट रहा है. कहने की आज़ादी के नाम पर उच्च शिक्षा संस्थान जूझ रहे हैं.  दूसरी ओर राहुल गांधी लेह- लद्दाख में मोटर बाईक पर  संवारी करते दिख रहे हैं. एक वायरल वीडियो के बाद एक सब्जी वाले को घर बुलाकर उसकी परेशानी पूछ रहे हैं.

दरअसल देश के तमाम राजनीतिक दल चुनावी राजनीति पर आकर टिक गए हैं.  मुफ्त योजनाओं के दम पर चुनाव जीतने का फार्मूला ढूंढ निकाला है. जनता का हक और उसके बुनियादी  मुद्दों पर एक भी राजनीतिक दल मैदान में नहीं है. भारत जोड़ो यात्रा के बाद अपनी व्यक्तिगत छवि चमकाने  में लगे राहुल गांधी और कांग्रेस अभी भी अलग- थलग दिखाई देती है. सड़क के मुद्दों से सरोकार हीन दिखती है.  

इंडिया के दूसरे नंबर के ताकतवर नेता शरद पंवार जो कृषि मंत्री रहे चुके हैं. वे भी इस  मामले में खामोश हैं क्योंकि मामला अदाणी पर आकर टिक गया है. संविधान को बदलने का मुद्दा उनका नहीं है क्योंकि उन्हें तो अजीत पंवार के साथ अपनी मुलाकातों के दौरे और उस पर सफाई से ही फुरसत नहीं है. नीतीश कुमार बेंगलुरु में तवज्जो नहीं मिलने से खींचे हुए हैं. वे दिल्ली आते हैं वाजपेई के स्मारक पर फूल चढ़ाने जाते हैं. मीड़िया को मसाला देते हैं . भाजपा और उनके बीच का ब्रिज वाजपेई के नाम है.  ममता जिस तरह हिंडनबर्ग की रिपोर्ट पर खामोश थी वैसी ही अब खामोश है. देश की प्रधानमंत्री बनने का ख्वाब देखने वाली ममता को संविधान, कृषि कानून और उच्च संस्थानों में मचे घमासान की जैसे भनक नहीं है.  पंजाब- दिल्ली ने सबसे ज्यादा किसान आंदोलन में अपने को झोंका है. जहां पर अरविंद केजरीवाल की पार्टी  चिमटा गाड़े हुए बैठी है. बावजूद इसके केजरीवाल का सरोकार किसान से ज्यादा चुनाव है.

संसद से सड़क गायब है. सड़क से विपक्ष गायब है. जनता सड़क पर है, आज़ादी के थके हुए रंगों की चादर ओढ़कर.

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